जब बच्ची ने पूछा मौलाना साहब क्या परसो ईद थी मेरे घर में गोश्त…..

आज ईद का तीसरा दिन था मैंने सोचा कि चलो करीब के कुछ गांव देखा हूं मैं एक गांव से गुजर रहा था एक छोटी बच्ची मेरे पास आई और मुझे सलाम करके पूछने लगी मौलाना साहब क्या परसों ईद थी मैंने कहा हां बेटी परसों ईद उल अजहा यानी कुर्बानी की ईद थी उस बच्ची ने फिर कहा हमारे घर भी कुछ लोगों ने गोश्त के कुछ टुकड़े भेज दिए थे लेकिन अम्मी ने कहा कि घर में तेल नहीं है इसलिए आज शाम को यह गोश्त आग में भूनकर खाएं।

इस बच्ची की इस बात ने मुझे एकदम हैरत में डाल दिया मैं रुक गया और उस बच्ची से पूछा क्या आपके घर में कुछ नहीं था उस बच्ची ने जो बातें कि मैं उनको सुनता रहा मेरी आंखों से आंसू बहते गए और मैं उस बच्ची को कोई जवाब नहीं दे सका कि मैं उसकी बातों से शर्मिंदा हो गया आप भी उस बच्ची की एक कुछ बातें सुन ले क्या यह बातें हमको एक मुसलमान के तौर पर शर्मिंदा करने के लिए काफी नहीं है।

उस बच्ची की मैं आंसू भरी आंखों से मेरी तरफ देख कर कहा मौलवी साहब मेरे पिता का इंतकाल कुछ साल पहले हुआ है हम घर में मां दो बहन एक छोटे भाई रहते हैं लॉकडाउन से पहले मेरी मां दूसरों के घरों में जाकर कुछ काम करती थी लेकिन अचानक लॉकडाउन की वजह कमाने का वो जरिया भी रुक गया लॉकडाउन के पहले महीने में कुछ लोगों ने कुछ राशन हमारे घर पहुंचाया और फिर रमजान के महीने में कुछ लोग आ गए और जरूरत का कुछ सामान हमारे घर पहुंचा दिया लेकिन रमजान के बाद से हमारे पास कोई नहीं आया।

उसने कहा मेरी अम्मी कहती थी ईद कुर्बानी आने वाली है तो हम गोश्त पकाएंगे और सब खुशी-खुशी ईद मनाएंगे और कभी अम्मी हमें प्यारे नबी हजरत मोहम्मद सल्लल्लाहो अलेही वसल्लम का ईद के दिन एक यतीम को अपने घर लाकर उस यतीम बच्चे को अपने मां बाप का प्यार देने का किस्सा सुनाती थी हम कुछ खुश होते कि ईद के दिन हमारे घर भी जरूर कोई आएगा क्योंकि हम मुस्लिम मोहल्ले में रहते हैं यहां सब आका के मानने वाले और उनके गुलाम रहते हैं जरूर कोई आएगा और हमको यतीमी के अहसास से आजाद करेगा लेकिन मौलाना साहब कोई नहीं आया हम इंतजार ही करते रहे ।

हमने देखा बहुत लोग हमारे घर के सामने की सड़क से गुजरे लेकिन हमारे पास कोई नहीं आया बहुत लोग अपने बच्चों को लेकर आए ताकि उनको हमारे खूबसूरत इलाकों की इस ईद के मौके पर सैर कराएं हां उनके बच्चे के हाथों में गुब्बारे भी थे लेकिन हमारे घर में कुछ नहीं था हम उन से मांगना चाहते थे मगर अम्मी रोक देती थी हां मौलाना साहब कुछ लोग हमारे घर गोश्त के चंद टुकड़े लाए लेकिन उन्होंने हमसे नहीं पूछा कि इस गोश्त को पकाने के लिए आपके घर में तेल मिर्च हल्दी है कि नहीं है कपड़ों की अब हमें जरूरत नहीं पुराने कपड़े ले कर भी क्या आप किसी गरीब के दरवाजे पर इस ईद पर गए क्या मौलाना साहब ईद गुजर गई क्या ? क्या यही ईद थी ।

लेख: तालिब बशीर नदवी ।

 

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