दुनिया में अकेली मुसलमान क़ौम ऐसी है जो झुकने को तय्यार नही, वरना हमने देखा है सैकड़ों सालों से…

दिन भर जुलूस के नाम पर पत्थरबाज़ी और आगजनी की गई फिर उसके बाद रात भर पुलिस ने घरों में घुसकर क्रैकडाउन किया। अगले दिन प्रशासन और सत्ता ने बुल्डोज़र से मकान दुकान गिराए। दुनिया में अकेली मुसलमान क़ौम ही इतना सब झेल कर के भी झुकने को तैयार नहीं। वरना हमने देखे हैं कौन किनके पैरों में सैकड़ों सालों से गिरे पड़े हैं। देखा है हमने, सब कुछ होते हुए भी पीठ पर और सरों पर पैर रखे जाते हुए।

जनसंख्या में अधिक होते हुए मार खाते और पिटते हुए, भेदभाव सहते हुए। सब देखा है इस देश में। बराबरी तो कभी नहीं रही यहां। और वह कभी होगी भी नहीं। ऊंच नीच का घृणित इतिहास है इस देश का, जिस पर अब सभी गर्व करते हैं। समान अधिकार और बराबरी जिनके शब्दकोश में ही नहीं वे क्या ही समझेंगे।

मज़हबी जुलूस के बाद दंगे नहीं हुए हैं, बल्कि देश भर में सत्ता एवं उसका संरक्षण प्राप्त आतंकियों द्वारा उन्हें परेशान करने की कोशिश की गई है जिनका स्वर्णिम इतिहास एवं वर्तमान अरब के रेगिस्तान से लेकर यूरोप के कलिसाओं में आज भी गूंजता है। जिस मज़हब की सदा हिंद के चारों कोनों में हर दिन पुकारी जाती है।

एक मज़हब जो अरब के कबीलों से होता हुआ दुनिया के हर एक मुल्क़ पर छा गया। तुम्हें हमारे मज़हब से परेशानी आज नहीं है, यह दुनिया के कायम होने और उसके खत्म होने तक रहेगी। हम लाख चाहें फिर भी ये आज और अभी से ठीक नहीं हो सकती। हम हक़ पर हैं, तुम अपनी सारी ताक़त लगा लो, हम अपने मज़हब से एक इंच भी जो हट गए तो समझो हम मर गए।

तुम चाहते हो कि तुम्हारा पैर हमारी पीठ पर हो, हमारे मुंह से तुम्हारी तारीफ निकले, इसमें कोई संदेह नहीं कि मुसलमानों ने ज़ालिम को ज़ालिम कहा और अपने रब को जो बहुत दयावान है उसकी इबादत की, उसके सामने सर झुकाया।

तुम कामयाब कभी नहीं होगे। निसंदेह हम अल्लाह और उसकी किताब और उसके रसूल पर यक़ीन लाए हैं। तुम्हें शायद इस बात का इल्म नहीं कि तुम्हारा यह अन्याय हमें अल्लाह और उसकी किताब और उसके नबी की तरफ और तेजी से ले जाएगा। तुम चाहते हो कि हम डर जाएं, तुम्हारे गलत को सही मान लें, तुम्हारी प्रताड़ना को अपनी किस्मत मान लें, इनमें से कुछ भी नहीं होगा।

तौहीद ओ रिसालत के नग़्में हमारे सीनों में जज़्ब हैं। मरते दम तक हमें कोई इससे अलग नहीं कर सकता। यही हमारा फैसला है। बाक़ि तुम अपनी कोशिशें करते रहो। हर मर्तबा हार का मुंह देखना पड़ेगा।

अल्लामा इक़बाल ने लिखा था-

शान आँखों में न जचती थी जहाँ-दारों की,
कलमा पढ़ते थे हमीं छाँव में तलवारों की,
हम जो जीते थे तो जंगों की मुसीबत के लिए,
और मरते थे तिरे नाम की अज़्मत के लिए,
थी न कुछ तेग़ज़नी अपनी हुकूमत के लिए,
सर-ब-कफ़ फिरते थे क्या दहर में दौलत के लिए?

क़ौम अपनी जो ज़र-ओ-माल-ए-जहाँ पर मरती,
बुत-फ़रोशीं के एवज़ बुत-शिकनी क्यूँ करती?
टल न सकते थे अगर जंग में अड़ जाते थे,
पाँव शेरों के भी मैदाँ से उखड़ जाते थे,
तुझ से सरकश हुआ कोई तो बिगड़ जाते थे,
तेग़ क्या चीज़ है हम तोप से लड़ जाते थे।

ये लेख मोहम्मद अनस के फेसबुक से ली गई है ।

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