एकलौता त्योहार जहां पैसा बाजार के बजाए गाँव की ओर आता है, ईदुल अज़हा पर पीयूष यादव की आंख खोलने….

बकरा ईद मुबारक : यही एक इकलौता बड़ा त्योहार है जहां पैसा बाजार की बजाय गांवों की ओर आता है। गांवों में गरीबों के लिए भेड़ बकरियां ATM की तरह होती हैं जिन्हें वे जरूरत के समय बेचकर पैसा कमा सकते हैं। बकरा ईद गरीबों की कमाई करवाता है, जिससे वो पैसा बच्चों की पढाई या परिवार के किसी बीमार की दवाई का सहारा बनता है..

वर्ना सब त्योहार बाजार के बनियों, पुजारियों और सुनारो को ही फायदा पहुंचाते हैं….किसानों की वर्णशंकर औलादों को इन बाजारु पाखंडीयों की बातों में आने की बजाय समझना चाहिए कि इस त्योहार का विरोध सिर्फ वे लोग कर रहे हैं जो खुद 1000 तरह का पाखंड फैलाकर कमाई करते हैं लेकिन किसान को आर्थिक रूप से बदहाल देखना चाहते हैं….

हर गाम में कई परिवार ऐसे होते हैं जिनकी कबीलदारी भेड़ बकरीयों से चलती है, उनके लिए आज Lottery का दिन है….. बकरा चाहे किसी अल्लाह के नाम पर कटे या बाबा/माता के नाम पे, आखिर बढ़ावा तो पशुपालन को मिलेगा….. और हाँ, आज दोगलापन दिखाने वाले 90% लोग खुद मांसाहारी हैं….

लेखक का निजी राय

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