1857 की क्रांति का वो महानायक जिसने दिया था जिहाद का फतवा,और फिर मंगल पाण्डेय ने…


1857 की क्रांति को अंग्रेज़ो ने भले ही एक फौजी बगावत का नाम दिया हो लेकिन असल मे यह अंग्रेज़ साम्राज्य के खिलाफ ऐसी पहली लड़ाई थी जो भारत के कोने कोने में लड़ी गई,इस लड़ाई के इतिहास पर अगर नज़र डालें तो पता चलता है कि इस लड़ाई के लिये मौलाना फज़्ले हक़ खैराबादी ने जिहाद का फतवा दिया था,साथ ही,मौलाना फज़्ले हक़ ने ही पहली बार इस बात का खुलासा किया था कि अंग्रेज़ फौज मे शामिल भारतीय जिन कारतूसो का इस्तेमाल करते है उन मे गाय और सुवर की चर्बी का इस्तेमाल किया गया है,यही वजह है कि बंगाल रेजिमेंट में तैनात सिपाही मंगल पाण्डेय ने धर्म भ्रष्ट होता देख फौज मे बगावत की नीव डाल दी।

मौलाना फज़्ले हक खैराबादी का जन्म 1797 मे सीतापुर ज़िले के कस्बा खैरबाद में हुवा आप फलसफा और मांतिक के बड़े जानकार थे,1857 की क्रांति से ठीक पहले आप ने जुमा की नमाज़ के वक़्त एक जोशीली तकरीर की और देश भर के मुसलमानो को सम्बोधित करते हुवे अंग्रेज़ों के खिलाफ जिहाद का फतवा दिया,जिसके बाद देश भर से मुस्लिम जवानो का जत्था अपने घरों से बाहर निकल आया और अंग्रेज़ साम्राज्य के खिलाफ जंग का एलान कर दिया,वहीं दूसरी तरफ बंगाल के बैरकपुर फौजी छावनी मे जैसे ही कारतूस मे चर्बी मिलाने की खबर पहुंची मंगल पाण्डेय के नेतृत्व मे फौज के लगभग 85 सिपाहियों ने बगावत कर दी,और धीरे धीरे ये आग पूरे देश मे फैल गई।

1759 मे भारत पर कब्ज़े की शुरुआत करने वाले अंग्रेज़ो के मुकाबले मे पहली बार मुस्लिमो के साथ साथ सभी वर्ग और धर्म के लोग लड़ाई मे शरीक थे,क्युंकि 1857 से पहले तक लड़ी जाने वाली तमाम जंगो मे अंग्रेज़ो के खिलाफ सिर्फ मुसलमान ही थे,11 मई 1857 को इस जंग की शुरुआत हुवी जो अलग अलग हिस्सो मे 1 नवम्बर 1858 तक लड़ी गई,इस लड़ाई मे अंग्रेज़ो की तरफ से राजपुताना,पटियाला कपूरथला जोधपुर और रामपुर की रियासतो ने भी हिस्सा लिया और अपने ही लोगों पर गोलियां बरसा कर गद्दारी और गुलामी की एक नई इबारत लिखी,यही वजह रही कि कुछ गद्दारो की गद्दारी की वजह से आज़ादी की इस लड़ाई मे क्रान्तिकारियों को हार का सामना करना पड़ा,बहादुर शाह जफर को गिरफ्तार कर बर्मा भेज दिया गया और ईस्ट इंडिया कम्पनी ने सत्ता की बागडोर ब्रिटिश महारानी को दे दिया।

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दिल्ली पर कब्ज़ा जमाने के बाद अंग्रेज़ो ने मौलाना फज़्ले हक को मोस्ट वांटेड की लिस्ट मे डाल दिया,लेकिन आप अपने परिवार के साथ छुपते छुपाते 5 दिनो तक भूखे प्यासे रहकर खैराबाद पहुंचे,यहां एक दिन रुक कर मौलाना अपने साथी जिहादियो के साथ अवध मे बेगम हज़रत महल के यहां पहुंचे जहाँ बेगम ने आपको अपना एडवाइजर और सेना प्रमुख बना दिया,जब अंग्रेज़ो ने अवध का घेराव किया तो 10 दिनों तक जंग लड़ी गई अधिक्तर जिहादी शहीद हो गये और मौलाना को गिरफ्तार कर लिया गया।

आप पर अंग्रेज़ हुकूमत के खिलाफ बगावत,जंग का एलान करने और अंग्रेज़ो के कत्ल का केस चलाया गया,क्युंकि कोर्ट मे आप अपना केस खुद लड़ रहे थे आपने भरे कोर्ट मे अंग्रेज़ जज से कहा कि जिहाद का फतवा मैंने दिया था और आज भी उसी फतवे पर कायम हूं फिर क्या था जज ने आपको उम्र कैद की सज़ा के लिये काला पानी भेजने का फैसला दिया और आपको काला पानी भेज दिया गया,जहाँ आपने जेल की दीवारो पर अंग्रेज़ो के ज़ुल्म की दास्तान और मुल्क के सियासी हालात पर अरबी मे कोयले से लिखा जिसे बाद मे किताब की शक्ल मे पब्लिश किया गया, 19 अगस्त 1861 को अण्डमान मे काला पानी की सज़ा के दौरान ही आपकी मृत्यू हो गई,वहीं कुछ इतिहासकारों की मानें तो आपको अंग्रेज़ो ने फांसी देकर शहीद कर दिया था।

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