लाल सिंह चड्ढा का विरोध तो मुसलमानों को करना था, फ़िल्म में मोहम्मद ज़ाहिद ने ऐसा क्या देखा कि वो….

किसी भी फिल्म के बहिष्कार का विरोध है। इसी के विरोध में आज आमिर खान की “लाल सिंह चड्ढा” देखने चला गया। मुझे समझ में नहीं आया कि भक्त बिरादरी ने इस फिल्म का बहिष्कार क्यों किया ? शायद आमिर खान के उर्दू नामधारी होने के ही कारण वर्ना इस फिल्म में भक्तों के लिए आमिर खान ने बहुत मसाला डाला है मोदी और उनका “अच्छे दिन” भी है।

एक चलती ट्रेन में बचपन से अपनी कहानी सुनाते “लाल सिंह चड्ढा” की पूरी थीम सिख धर्म के आस पास है , कहीं कहीं सिख धर्म और उसकी परंपरा का महिमामंडन भी है वहीं इस्लाम की कुछ मान्यताओं पर कटाक्ष भी है। भक्तों को और क्या चाहिए ? लाल सिंह चड्ढा के बचपन की स्मृतियां इंदिरा गांधी के इमरजेंसी लगाने से शुरू होती है , इंदिरा गांधी की हत्या ,84 दंगा और बाबरी मस्जिद के विध्वंस तक आमिर खान को किसी धर्म की गलती नहीं लगती पर कसाब और मुंबई हमले पर उनको जन्नत की 72 हूरें दिखाना और मौलाना की तकरीर फिल्म में दिखाना ज़रूरी लगता है।

अपनी अप्सराओं को भूलकर हूरों के ज़िक्र पर भरे हाल में मौजूद लोगों द्वारा ठहाका लगाना आमिर खान की व्यवसायिक धुर्तता ही सिद्ध करता है। दाढी रखे मुहम्मद नाम के एक पाकिस्तानी फौजी को कारगिल से बचा कर लाल सिंह चड्ढा तो लाता है मगर उसी दाढी वाले मुहम्मद नाम के फौजी को बार में शराब पीता दिखाना आमिर खान का भक्तों की नफ़रत वाली नस पकड़ने के लिए ही था। यद्यपि मुहम्मद की जगह कुछ और नाम रखा जा सकता था।

आमिर खान ने इस दो कौड़ी की फिल्म के लिए माफी भी मांगी दाढी रखे मुहम्मद नाम के एक किरदार को शराब भी पिलाई , मौलानाओं पर तंज भी किया, मगर वह भक्तों के दिल में उतर जाएंगे यह असंभव है। इसीलिए शाहरुख खान मुझे पसंद है बंदा बाल ठाकरे के आगे नहीं झुका। लाल सिंह चड्ढा को 10 में से 2 नंबर, सिर्फ आमिर खान की ऐक्टिंग के लिए। आमिर खान की अब तक की सबसे बेकार फिल्म। यद्यपि फिल्म का बहिष्कार फिर भी उचित नहीं।

लेखक के निजी विचार है Mohd Zahid

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